Ayodhya News: अयोध्या स्थित डॉ. राममनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय के श्रीराम शोध पीठ में व्यवसाय प्रबंध एवं उद्यमिता विभाग एवं श्रीराम शोध पीठ के अंतर्गत संचालित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के समापन अवसर पर विद्वानों एवं शोधार्थियों के द्वारा शोध पत्र प्रस्तुत किया गया.संगोष्ठी के दौरान वक्ताओं ने भारतीय संस्कृति, नैतिक मूल्यों एवं आधुनिक प्रबंधन के मध्य समन्वय स्थापित करने की आवश्यकता पर विशेष बल दिया.
मुख्य वक्ता प्रो. रितु नारंग ने क्या कहा?
मुख्य वक्ता प्रबंधन विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय की प्रो. रितु नारंग ने प्रबंधकीय नैतिकता विषय पर व्याख्यान दिया.उन्होंने कहा कि किसी भी संगठन की दीर्घकालिक सफलता केवल लाभ अर्जित करने पर निर्भर नहीं करती, बल्कि उसके नैतिक मूल्यों, ईमानदारी, पारदर्शिता, सामाजिक उत्तरदायित्व तथा उत्तरदायी नेतृत्व पर आधारित होती है.उन्होंने उदाहरणों के माध्यम से बताया कि नैतिक निर्णय कर्मचारियों, ग्राहकों, निवेशकों एवं समाज के बीच विश्वास स्थापित करते हैं, जिससे संगठन की विश्वसनीयता और प्रतिष्ठा बढ़ती है.
उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल प्रबंधन तथा वैश्विक प्रतिस्पर्धा के दौर में नैतिक निर्णय लेना पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गया है.प्रत्येक प्रबंधक को अपने निर्णयों में निष्पक्षता, जवाबदेही एवं संवेदनशीलता को प्राथमिकता देनी चाहिए.उन्होंने विद्यार्थियों को सलाह दी कि वे केवल सफल प्रबंधक बनने का लक्ष्य न रखें, बल्कि ऐसे उत्तरदायी एवं नैतिक नेतृत्वकर्ता बनें जो समाज एवं राष्ट्र के विकास में सकारात्मक योगदान दे सकें.
रामायण, महाभारत तथा कौटिल्य के अर्थशास्त्र का उल्लेख
विशिष्ट वक्ता प्रबंधन विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय के प्रो. अजय प्रकाश, ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा केवल आध्यात्मिक या सांस्कृतिक धरोहर नहीं है, बल्कि यह प्रभावी नेतृत्व, संगठन प्रबंधन, निर्णय निर्माण, मानव संसाधन विकास तथा सुशासन के अनेक व्यावहारिक सिद्धांत भी प्रदान करती है. उन्होंने वेद, उपनिषद, भगवद्गीता, रामायण, महाभारत तथा कौटिल्य के अर्थशास्त्र का उल्लेख करते हुए बताया कि इन ग्रंथों में वर्णित नेतृत्व, कर्तव्यनिष्ठा, रणनीतिक सोच, संसाधनों के कुशल उपयोग, लोकहित एवं सतत विकास के सिद्धांत आज के आधुनिक प्रबंधन में भी समान रूप से उपयोगी हैं.
उन्होंने कहा कि नई शिक्षा नीति-2020 भारतीय ज्ञान प्रणाली को शिक्षा एवं शोध का महत्वपूर्ण आधार मानती है, इसलिए प्रबंधन शिक्षा में भारतीय दृष्टिकोण को शामिल करना समय की आवश्यकता है.उन्होंने विद्यार्थियों से भारतीय ज्ञान परंपरा का गहन अध्ययन कर उसे आधुनिक प्रबंधन की चुनौतियों के समाधान में उपयोग करने का आह्वान किया.
25 शोधार्थियों ने अपना रिसर्च पेपर प्रस्तुत किया
कार्यक्रम के अंत में प्रतिभागियों ने दोनों विशेषज्ञों से विभिन्न विषयों पर प्रश्न पूछे और पैनल डिस्कशन के बाद रिसर्च पेपर प्रेजेंटेशन हुआ जिसमें कलश 25 शोधार्थियों ने अपना रिसर्च पेपर प्रस्तुत किया. डॉ. राना रोहित सिंह विशेषज्ञों को पुष्पगुच्छ एवं स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया और आभार व्यक्त करते हुए कहा कि प्रबंध को भारतीय ज्ञान परम्परा से जोड़ते हुए कई सारे गूढ़ बातें बताई जो हमारे विद्यार्थियों एवं शोधार्थियों के लिए बहुत ही उपयोगी होगा.
विभागाध्यक्ष प्रो. शैलेंद्र कुमार वर्मा ने इस संगोष्ठी को अत्यंत ज्ञानवर्धक, प्रेरणादायी एवं समसामयिक बताया.उन्होंने आशा व्यक्त किया कि विद्यार्थियों एवं शोधार्थियों को भारतीय ज्ञान परंपरा तथा नैतिक प्रबंधन के सिद्धांतों को समझने और व्यवहार में अपनाने का अवसर मिलता रहेगा.कार्यक्रम का संचालन डॉ. राकेश कुमार ने किया उन्होंने सभी अतिथियों एवं संगोष्ठी से जुड़े सभी लोगों का आभार व्यक्त किया.
कार्यक्रम के समापन अवसर पर प्रो. हिमांशु शेखर सिंह ने सभी मुख्य अतिथियों, वक्ताओं, शिक्षकों, शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों का स्वागत किया.उन्होंने कहा कि आज के प्रतिस्पर्धी एवं वैश्विक व्यावसायिक परिवेश में केवल तकनीकी ज्ञान ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि नैतिकता, मानवीय मूल्य, पारदर्शिता तथा उत्तरदायित्व भी सफल प्रबंधन की आधारशिला हैं.उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा में वर्णित नेतृत्व, निर्णय क्षमता, अनुशासन एवं लोककल्याण की अवधारणाएँ आज भी प्रबंधन शिक्षा के लिए अत्यंत प्रासंगिक हैं.उन्होंने विद्यार्थियों से भारतीय चिंतन को आधुनिक प्रबंधन सिद्धांतों के साथ जोड़कर अध्ययन एवं शोध करने का आह्वान किया तथा ऐसे शैक्षणिक आयोजनों को ज्ञान-विनिमय का प्रभावी मंच बताया.


