Delhi Master Plan 2047: दिल्ली के पुराने औद्योगिक इलाकों की पहचान आने वाले वर्षों में पूरी तरह बदल सकती है. मास्टर प्लान-2047 के तहत नरेला, ओखला, वजीरपुर, मायापुरी और आनंद पर्वत जैसे पुराने औद्योगिक क्षेत्रों को प्रदूषणकारी उद्योगों से मुक्त कर आधुनिक कारोबारी और रोजगार केंद्रों के रूप में विकसित करने की योजना है. अगर प्रस्ताव जमीन पर उतरा तो जहां आज धुआं उगलती फैक्ट्रियां नजर आती हैं, वहां भविष्य में IT पार्क, स्टार्टअप, रिसर्च सेंटर और आधुनिक ऑफिस दिखाई दे सकते हैं.
‘ग्रे से ग्रीन’ की ओर बढ़ेगी दिल्ली
मास्टर प्लान के तहत ज्यादा प्रदूषण फैलाने वाली और बड़े भू-भाग की जरूरत वाली फैक्ट्रियों को चरणबद्ध तरीके से दिल्ली से बाहर स्थानांतरित करने की योजना है. उनकी जगह गैर-प्रदूषणकारी और ज्यादा मूल्य वाली गतिविधियों को बढ़ावा दिया जाएगा. इसे दिल्ली के औद्योगिक इलाकों के लिए ‘ग्रे-टू-ग्रीन’ बदलाव के तौर पर देखा जा रहा है. इसका मकसद एक तरफ प्रदूषण कम करना है, तो दूसरी तरफ सीमित जमीन पर ज्यादा रोजगार और आधुनिक कारोबार के अवसर पैदा करना है.
फैक्ट्री की जमीन पर खुल सकेंगे IT ऑफिस और स्टार्टअप
योजना के तहत औद्योगिक जमीन के इस्तेमाल के मौजूदा नियमों में बदलाव का प्रस्ताव है. अभी जिन भूखंडों का इस्तेमाल मुख्य रूप से उत्पादन और फैक्ट्री गतिविधियों के लिए होता है, वहां भविष्य में IT कंपनियां, कॉरपोरेट ऑफिस, डिजाइन स्टूडियो, स्टार्टअप और रिसर्च एंड डेवलपमेंट सेंटर जैसी गतिविधियों को जगह मिल सकती है. भू-उपयोग परिवर्तन की प्रक्रिया को भी आसान बनाने का प्रस्ताव है. इससे पुरानी फैक्ट्री की जमीन को नए कारोबार के लिए इस्तेमाल करने में आने वाली कागजी बाधाएं कम हो सकती हैं.
बहुमंजिला इमारतों से बढ़ेंगे रोजगार के मौके
कम जमीन में ज्यादा कारोबारी गतिविधियों को जगह देने के लिए बहुमंजिला इमारतों की अनुमति और अतिरिक्त FAR का प्रावधान किए जाने की संभावना है. इससे औद्योगिक क्षेत्रों में आधुनिक कार्यालयों और रोजगार के लिए अतिरिक्त जगह तैयार हो सकेगी.
दिल्ली से बाहर जा सकती हैं प्रदूषणकारी फैक्ट्रियां
ज्यादा प्रदूषण फैलाने वाली और बड़े क्षेत्र की जरूरत वाली इकाइयों को दिल्ली से बाहर स्थानांतरित करने की योजना है. इसके लिए हरियाणा के कुंडली और बहादुरगढ़ तथा उत्तर प्रदेश के नोएडा और ग्रेटर नोएडा जैसे औद्योगिक क्षेत्रों को विकल्प के तौर पर देखा जा सकता है. नरेला, ओखला और वजीरपुर जैसे क्षेत्रों में इसका असर खास तौर पर दिखाई दे सकता है, क्योंकि कई जगह औद्योगिक और रिहायशी इलाके एक-दूसरे के करीब हैं. प्रदूषणकारी इकाइयों की जगह IT और सर्विस सेक्टर आने से स्थानीय स्तर पर भी रोजगार के नए अवसर बन सकते हैं.
कारोबारियों ने जताई उम्मीद, लेकिन चेताया भी
बवाना मैन्युफैक्चरर्स वेलफेयर एसोसिएशन के अध्यक्ष राजीव गोयल ने कहा कि मास्टर प्लान-2047 में औद्योगिक क्षेत्रों की बेहतरी के लिए किए गए प्रावधान सराहनीय हैं. हालांकि, उन्होंने जोर दिया कि योजना को जमीन पर उतारने में गंभीरता और ईमानदारी जरूरी है. उनके मुताबिक, ऐसा नहीं हुआ तो मास्टर प्लान भी सिर्फ कागजी दस्तावेज बनकर रह जाएगा. दिल्ली प्लास्टिक पैकेजिंग इंडस्ट्रीज एसोसिएशन के अध्यक्ष दिनेश कुमार ने कहा कि मास्टर प्लान से उम्मीदें बंधी हैं, लेकिन औद्योगिक क्षेत्रों के सुनियोजित विकास पर भी ध्यान देना होगा. उन्होंने फायर सेफ्टी, सड़कों की मरम्मत और बिजली कनेक्शन जैसी बुनियादी सुविधाओं को बेहतर करने की जरूरत बताई.
फेडरेशन ऑफ ओखला इंडस्ट्रियल एसोसिएशन्स के वित्त सचिव प्रवीण शर्मा के अनुसार, एमपीडी-2047 दिल्ली के पुराने औद्योगिक क्षेत्रों को आधुनिक जरूरतों के अनुरूप विकसित करने का बड़ा अवसर है. IT, ITES, रिसर्च एंड डेवलपमेंट, स्टार्टअप, डिजाइन और तकनीकी गतिविधियों को बढ़ावा देकर दिल्ली को गुरुग्राम, नोएडा, बेंगलुरु और हैदराबाद की तर्ज पर तकनीकी हब के रूप में विकसित किया जा सकता है.
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लाखों युवाओं के लिए खुल सकता है रोजगार का रास्ता
अगर योजना को प्रभावी और व्यावहारिक तरीके से लागू किया गया तो दिल्ली-एनसीआर में नई पीढ़ी के उद्योगों को बढ़ावा मिल सकता है. इससे IT और सर्विस सेक्टर का विस्तार होने के साथ ही प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार के बड़े अवसर पैदा होने की उम्मीद है. यानी आने वाले वर्षों में दिल्ली के पुराने औद्योगिक इलाकों की पहचान सिर्फ फैक्ट्रियों और धुएं से नहीं, बल्कि IT, स्टार्टअप, टेक्नोलॉजी और आधुनिक रोजगार केंद्रों से हो सकती है. लेकिन इस सपने को हकीकत में बदलने की असली परीक्षा मास्टर प्लान की घोषणा नहीं, बल्कि उसके ईमानदार और समयबद्ध क्रियान्वयन की होगी.


