उत्तराधिकार और वसीयत से जुड़े मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है, जिसका असर भविष्य में आने वाले कई मामलों पर पड़ सकता है. अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी व्यक्ति को पहले से दिए गए प्रोबेट (Probate) को रद्द कराना है, तो उसके लिए भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 में कोई अलग समय सीमा निर्धारित नहीं की गई है. ऐसी स्थिति में लिमिटेशन एक्ट, 1963 की धारा 137 लागू होगी.
यह फैसला इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि लंबे समय से इस बात को लेकर विभिन्न अदालतों में बहस होती रही है कि प्रोबेट रद्द करने की याचिका कितने समय के भीतर दाखिल की जा सकती है.
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क्या होता है प्रोबेट?
जब कोई व्यक्ति वसीयत (Will) छोड़कर मृत्यु को प्राप्त होता है, तो कई मामलों में अदालत से उस वसीयत की वैधता की पुष्टि करानी पड़ती है. अदालत द्वारा दी गई इस आधिकारिक स्वीकृति को प्रोबेट कहा जाता है.
प्रोबेट मिलने के बाद संबंधित वसीयत को कानूनी मान्यता मिल जाती है और संपत्ति के हस्तांतरण या उत्तराधिकार की प्रक्रिया आगे बढ़ सकती है.
हालांकि यदि बाद में यह आरोप लगे कि वसीयत धोखाधड़ी से प्राप्त की गई थी, महत्वपूर्ण तथ्य छिपाए गए थे या प्रक्रिया में गंभीर त्रुटि थी, तो प्रोबेट को रद्द कराने की मांग भी की जा सकती है.
सुप्रीम कोर्ट के सामने क्या था मामला?
मामला एक ऐसे विवाद से जुड़ा था जिसमें प्रोबेट पहले ही दिया जा चुका था. बाद में कुछ पक्षकारों ने इसे रद्द कराने के लिए आवेदन दायर किया. उनका कहना था कि उन्हें प्रोबेट के बारे में बाद में जानकारी मिली.
दूसरी ओर यह तर्क दिया गया कि संबंधित पक्षों को वर्षों पहले ही ऐसे घटनाक्रम की जानकारी मिल चुकी थी, इसलिए इतनी देरी से दायर आवेदन स्वीकार नहीं किया जा सकता.
कोर्ट ने क्या कहा?
न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ ने कहा कि भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम में प्रोबेट रद्द करने के लिए कोई विशेष समय सीमा निर्धारित नहीं है. इसलिए ऐसे मामलों में लिमिटेशन एक्ट की धारा 137 लागू होगी, जो उन आवेदनों पर लागू होती है जिनके लिए अलग से कोई समय सीमा निर्धारित नहीं की गई है.
अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में सामान्यतः तीन वर्ष की समय सीमा लागू होगी.
“जानकारी कब मिली” क्यों बना अहम मुद्दा?
फैसले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि अदालत ने केवल वास्तविक जानकारी (Actual Knowledge) ही नहीं बल्कि “Constructive Notice” यानी परिस्थितियों से प्राप्त मानी जाने वाली जानकारी को भी महत्व दिया.
कोर्ट ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति को किसी कानूनी प्रक्रिया या म्यूटेशन कार्यवाही का नोटिस मिला था, तो उससे यह अपेक्षा की जाती है कि वह यह जानने की कोशिश करे कि नोटिस क्यों भेजा गया है और उसका उसके अधिकारों पर क्या प्रभाव पड़ सकता है.
क्यों खारिज हो गई याचिका?
सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि संबंधित पक्षों को वर्ष 2013 में म्यूटेशन प्रक्रिया के दौरान नोटिस मिला था. अदालत के अनुसार एक समझदार व्यक्ति को ऐसी स्थिति में आगे की जानकारी जुटानी चाहिए थी.
लेकिन ऐसा नहीं किया गया और प्रोबेट रद्द करने का आवेदन कई वर्षों बाद 2022 में दाखिल किया गया. कोर्ट ने माना कि तीन वर्ष की समय सीमा काफी पहले समाप्त हो चुकी थी, इसलिए आवेदन समयबद्ध नहीं था.
भविष्य के मामलों पर क्या होगा असर?
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यह फैसला प्रोबेट और उत्तराधिकार संबंधी मामलों में महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है.
अब यह अधिक स्पष्ट हो गया है कि:
- प्रोबेट रद्द करने की याचिका पर धारा 137 लागू होगी.
- सामान्य सीमा तीन वर्ष मानी जाएगी.
- केवल “मुझे जानकारी नहीं थी” कहना पर्याप्त नहीं होगा.
- अदालत यह भी देखेगी कि क्या संबंधित व्यक्ति को परिस्थितियों से जानकारी मिल जानी चाहिए थी.
इससे भविष्य में ऐसे मामलों में देरी से दाखिल याचिकाओं की जांच और अधिक सख्ती से हो सकती है.
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फैसले का व्यापक महत्व
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय केवल एक संपत्ति विवाद तक सीमित नहीं है. यह उन हजारों मामलों के लिए मार्गदर्शन प्रदान करता है जिनमें वसीयत, उत्तराधिकार और प्रोबेट से जुड़े अधिकारों को लेकर विवाद उत्पन्न होते हैं.
अदालत ने स्पष्ट संदेश दिया है कि कानूनी अधिकारों की रक्षा के लिए समय पर कार्रवाई करना आवश्यक है. यदि किसी व्यक्ति को किसी प्रक्रिया की जानकारी मिलने के संकेत मिल चुके हों, तो वह अनिश्चितकाल तक इंतजार नहीं कर सकता.
यही कारण है कि उत्तराधिकार कानून से जुड़ा यह फैसला कानूनी क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण निर्णय के रूप में देखा जा रहा है.
Source: LiveLaw (Supreme Court), Dhiraj Dutta v. Anirban Sen & Ors., 12 June 2026.


