अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में बड़ी गिरावट के बाद भारत में पेट्रोल और डीजल के दाम कम करने की मांग तेज हो गई है. देश के प्रमुख ट्रांसपोर्ट संगठनों ने केंद्र सरकार से अपील की है कि वैश्विक बाजार में सस्ता हुआ कच्चा तेल अब आम उपभोक्ताओं और ट्रांसपोर्ट सेक्टर तक भी राहत के रूप में पहुंचना चाहिए. रिपोर्ट्स के अनुसार ब्रेंट क्रूड की कीमत लगभग 90 डॉलर प्रति बैरल तक आ गई है, जिसके बाद ट्रांसपोर्ट उद्योग ने ईंधन दरों में कटौती की मांग दोहराई है.
ट्रांसपोर्ट संगठनों का कहना है कि डीजल की ऊंची कीमतों का असर केवल ट्रक ऑपरेटरों पर नहीं बल्कि देशभर में सामान ढुलाई लागत, महंगाई और रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतों पर भी पड़ता है.
किस संगठन ने उठाई मांग?
ऑल इंडिया मोटर ट्रांसपोर्ट कांग्रेस (AIMTC) और अन्य ट्रांसपोर्ट संगठनों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्र सरकार से डीजल की कीमतों में राहत देने की मांग की है. संगठन का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में हाल के सप्ताहों में तेज गिरावट आई है, लेकिन इसका पूरा लाभ अभी तक घरेलू उपभोक्ताओं को नहीं मिला है.
AIMTC के अनुसार डीजल वाणिज्यिक वाहनों की कुल परिचालन लागत का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा होता है. ऐसे में ईंधन महंगा रहने से ट्रांसपोर्ट व्यवसाय पर भारी दबाव पड़ रहा है.
कच्चे तेल की कीमतों में कितनी गिरावट आई?
रिपोर्ट्स के मुताबिक मई 2026 के दौरान अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों में करीब 20 प्रतिशत तक की गिरावट दर्ज की गई. ब्रेंट क्रूड लगभग 104 डॉलर प्रति बैरल के स्तर से गिरकर 90 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गया.
इसके अलावा भारतीय कच्चे तेल की टोकरी (Indian Crude Basket) भी लंबे समय बाद 100 डॉलर प्रति बैरल से नीचे पहुंची है, जिसे ऊर्जा बाजार के लिए महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है.
ट्रांसपोर्ट सेक्टर क्यों दबाव में है?
ट्रांसपोर्ट इंडस्ट्री का कहना है कि पिछले कुछ समय में ईंधन लागत काफी बढ़ी है. हाल ही में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में कई बार बढ़ोतरी भी हुई थी, जिससे ट्रक ऑपरेटरों और छोटे बेड़े मालिकों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ा. विशेषज्ञों के अनुसार:
- डीजल महंगा होने से माल ढुलाई लागत बढ़ती है
- लॉजिस्टिक्स खर्च बढ़ने से वस्तुओं की कीमत प्रभावित होती है
- छोटे ट्रांसपोर्ट ऑपरेटरों का मार्जिन कम होता है
- सप्लाई चेन पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है
इसी वजह से ट्रांसपोर्ट संगठन ईंधन दरों में राहत को जरूरी बता रहे हैं.
क्या तुरंत सस्ते हो सकते हैं पेट्रोल और डीजल?
हालांकि कच्चे तेल की कीमतें घटी हैं, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि घरेलू ईंधन कीमतें केवल अंतरराष्ट्रीय क्रूड के आधार पर तय नहीं होतीं. इसमें कई अन्य कारक भी शामिल होते हैं:
टैक्स और ड्यूटी
पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमत में केंद्र और राज्य सरकारों के करों का बड़ा हिस्सा होता है.
रुपये की स्थिति
यदि डॉलर के मुकाबले रुपया कमजोर होता है तो आयात लागत बढ़ सकती है.
तेल कंपनियों की रिकवरी
तेल विपणन कंपनियों (OMCs) को पिछले नुकसान की भरपाई भी करनी पड़ सकती है.
वैश्विक भू-राजनीतिक जोखिम
मध्य पूर्व की स्थिति और समुद्री मार्गों में व्यवधान जैसे कारक भी कीमतों को प्रभावित करते हैं.
तेल कंपनियों की क्या स्थिति है?
हालिया रिपोर्ट्स के अनुसार सरकारी तेल विपणन कंपनियां अभी भी कुछ ईंधन श्रेणियों पर दबाव झेल रही हैं. विश्लेषकों का अनुमान है कि कंपनियों को पूरी तरह संतुलन की स्थिति में आने के लिए कच्चे तेल की कीमत और नीचे, लगभग 85-87 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचने की जरूरत पड़ सकती है.
यही वजह है कि कच्चे तेल में गिरावट के बावजूद तत्काल बड़ी कीमत कटौती को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है.
दिल्ली में अभी क्या हैं ईंधन के दाम?
हालिया अपडेट के अनुसार नई दिल्ली में डीजल की कीमत लगभग ₹95.20 प्रति लीटर बनी हुई है. वहीं पेट्रोल की कीमत भी 100 रुपये प्रति लीटर के ऊपर बनी हुई है.
ट्रांसपोर्ट संगठनों का कहना है कि मौजूदा दरें अभी भी उनके लिए काफी ऊंची हैं, खासकर तब जब वैश्विक कच्चे तेल में गिरावट देखी जा रही है.
सरकार ने हाल में क्या कदम उठाए?
सरकार ने हाल ही में पेट्रोल, डीजल और एविएशन टरबाइन फ्यूल (ATF) के निर्यात पर लगने वाली विशेष अतिरिक्त उत्पाद शुल्क (SAED) में कटौती की है. यह फैसला 1 जून से लागू होगा. हालांकि घरेलू पेट्रोल और डीजल पर लगने वाले उत्पाद शुल्क में फिलहाल कोई बदलाव घोषित नहीं किया गया है.
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महंगाई पर क्या पड़ सकता है असर?
आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि डीजल की कीमतों में कमी आती है तो:
- ट्रांसपोर्ट लागत कम हो सकती है
- खाद्य और उपभोक्ता वस्तुओं की सप्लाई लागत घट सकती है
- लॉजिस्टिक्स सेक्टर को राहत मिल सकती है
- महंगाई दबाव कुछ कम हो सकता है
इसी वजह से उद्योग संगठन सरकार से ईंधन कीमतों की समीक्षा करने की मांग कर रहे हैं.
आगे क्या देखना होगा?
अब सबकी नजर इस बात पर रहेगी कि कच्चे तेल की कीमतें आने वाले हफ्तों में किस दिशा में जाती हैं और सरकार तथा तेल कंपनियां घरेलू ईंधन कीमतों को लेकर क्या फैसला लेती हैं. फिलहाल ट्रांसपोर्ट सेक्टर का कहना है कि वैश्विक बाजार में आई गिरावट का लाभ आम लोगों और उद्योग दोनों तक पहुंचना चाहिए.


