Auraiya Pawan Satya Niketan: बेहतर भविष्य का सपना लेकर औरैया से दिल्ली आया पवन अब कभी अपने घर नहीं लौट सकेगा. सत्य निकेतन में 30 साल पुरानी पीजी इमारत के अचानक ढहने से पवन समेत सात लोगों की मौत ने राजधानी में छात्रों और किरायेदारों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. हादसे ने जर्जर इमारतों, अवैध निर्माण और भवनों की निगरानी को लेकर प्रशासन की जिम्मेदारी पर भी सवालिया निशान लगा दिया है.
उत्तर प्रदेश के औरैया का रहने वाला पवन भी उन लाखों युवाओं में शामिल था, जो अपने सपनों को हकीकत में बदलने के लिए दिल्ली आते हैं. देशभर से छात्र दिल्ली विश्वविद्यालय और राजधानी के दूसरे शिक्षण संस्थानों में पढ़ाई करने पहुंचते हैं. उनके माता-पिता उन्हें इस उम्मीद के साथ घर से दूर भेजते हैं कि उनका बच्चा पढ़-लिखकर कुछ बनेगा, परिवार का नाम रोशन करेगा और अपने पैरों पर खड़ा होगा. लेकिन जब वही बच्चा घर लौटने के बजाय मौत की खबर बन जाए, तो उस परिवार पर क्या गुजरती है, इसे शब्दों में बयां करना आसान नहीं है.
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सत्य निकेतन में भरभराकर गिरी इमारत
दिल्ली के सत्य निकेतन में रविवार, 6 सितंबर को पीजी के तौर पर इस्तेमाल की जा रही एक इमारत अचानक भरभराकर गिर गई. कुछ ही पलों में पूरी इमारत मलबे में तब्दील हो गई और उसके भीतर मौजूद लोगों की जिंदगी खतरे में पड़ गई. हादसे की सूचना मिलते ही राहत और बचाव दल मौके पर पहुंचा. मलबे के नीचे दबे लोगों की तलाश में कई घंटे तक रेस्क्यू ऑपरेशन चलता रहा. बचावकर्मी बेहद सावधानी से मलबा हटाते रहे, ताकि अगर कोई व्यक्ति जिंदा हो तो उसे सुरक्षित बाहर निकाला जा सके. अब तक हादसे में सात लोगों की मौत की खबर सामने आई है.
मलबे में जिंदगी तलाशते रहे बचावकर्मी
सत्य निकेतन दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों के बीच पीजी और किराये के कमरों के लिए जाना जाता है. रविवार को विश्वविद्यालय के कॉलेज बंद होने के कारण बड़ी संख्या में छात्र अपने पीजी या कमरों में मौजूद रहे होंगे. ऐसे में इमारत के गिरने के बाद मलबे में और लोगों के दबे होने की आशंका ने चिंता और बढ़ा दी. इलाके की संकरी गलियां, छोटी-बड़ी पुरानी इमारतें और लगातार बढ़ती आबादी पहले से ही यहां के बुनियादी ढांचे पर दबाव बढ़ा रही हैं. हादसे के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है, जिस इमारत में छात्र और दूसरे लोग रह रहे थे, उसकी सुरक्षा और संरचनात्मक स्थिति की आखिरी बार जांच कब हुई थी?
करीब 30 साल पुरानी थी इमारत, फिर भी लोग क्यों रह रहे थे?
बताया जा रहा है कि हादसे का शिकार हुई इमारत करीब 30 साल पुरानी थी. समय के साथ किसी भी पुराने भवन के रखरखाव और संरचनात्मक सुरक्षा की नियमित जांच जरूरी हो जाती है. ऐसे में सवाल उठता है कि अगर इमारत की हालत खराब थी तो वहां लोगों के रहने की स्थिति कैसे बनी रही? यह सवाल केवल एक इमारत तक सीमित नहीं है. सत्य निकेतन जैसे घनी आबादी वाले इलाकों में पुरानी इमारतों में समय के साथ निर्माण, मरम्मत और बदलाव होते रहते हैं. कई जगह अतिरिक्त मंजिलें या दूसरे तरह के निर्माण किए जाते हैं. इससे भवन की मूल संरचना पर अतिरिक्त भार पड़ने की आशंका रहती है. ऐसे में सवाल यह भी है कि क्या इलाके की पुरानी इमारतों का समय-समय पर सुरक्षा ऑडिट होता है? क्या भवनों में किए जा रहे अतिरिक्त निर्माण की निगरानी की जाती है?
अगर खतरा पहले से था तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
किसी इमारत के जर्जर होने की स्थिति आमतौर पर एक दिन में पैदा नहीं होती. दीवारों में दरारें, कमजोर ढांचा, पुरानी छत या अनधिकृत निर्माण जैसे संकेत समय रहते नजर आ सकते हैं. तो सवाल है, क्या प्रशासन को ऐसी इमारतों की स्थिति की जानकारी थी? अगर जानकारी थी, तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई? और अगर जानकारी नहीं थी, तो भवन निरीक्षण की व्यवस्था कितनी प्रभावी है?
किसी भी शहर में प्रशासन की जिम्मेदारी केवल हादसे के बाद राहत और बचाव अभियान चलाने तक सीमित नहीं हो सकती. उससे बड़ी जिम्मेदारी यह सुनिश्चित करने की है कि जर्जर और संभावित रूप से खतरनाक इमारतों की पहचान समय रहते हो और उनमें रहने वाले लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए.
सत्य निकेतन में पहले भी हो चुका है जानलेवा हादसा
सत्य निकेतन में इमारतों और निर्माण की सुरक्षा को लेकर सवाल पहले भी उठ चुके हैं. अप्रैल 2022 में एक इमारत में रेनोवेशन और निर्माण कार्य के दौरान हादसा हुआ था, जिसमें दो मजदूरों की मौत हो गई थी. मौजूदा हादसे के बाद अब यह सवाल फिर सामने है कि पिछली घटना से क्या सबक लिया गया? क्या इलाके की दूसरी पुरानी और कमजोर इमारतों का सर्वे हुआ? क्या संभावित रूप से खतरनाक भवनों की पहचान की गई? क्या जरूरत पड़ने पर लोगों को ऐसी इमारतों से बाहर निकाला गया?
अगर ऐसा नहीं हुआ तो क्यों?
इन सवालों के जवाब अब सिर्फ प्रशासन से नहीं, बल्कि उन तमाम एजेंसियों से भी मांगे जा रहे हैं जिनकी जिम्मेदारी भवन सुरक्षा और निर्माण नियमों के पालन की निगरानी की है.
पवन की मौत सिर्फ एक परिवार का दुख नहीं
औरैया के पवन की मौत ने उसके परिवार से उनका अपना छीन लिया. लेकिन पवन की कहानी सिर्फ एक परिवार की त्रासदी नहीं है. यह उन लाखों परिवारों की चिंता भी है, जो अपने बच्चों को पढ़ाई और बेहतर भविष्य के लिए दूसरे शहरों में भेजते हैं. एक परिवार अपने बच्चे को दिल्ली भेजते वक्त यह उम्मीद करता है कि वह सुरक्षित रहेगा. वह हर दिन यह जांच नहीं कर सकता कि जिस कमरे में उसका बच्चा रह रहा है, उसकी दीवार कितनी मजबूत है, निर्माण नियमों के मुताबिक हुआ है या नहीं या भवन में रहने की अनुमति है या नहीं. यह सुनिश्चित करना संबंधित संस्थाओं और प्रशासन की जिम्मेदारी है.
हादसे के बाद नहीं, हादसे से पहले जागना होगा
सत्य निकेतन का हादसा सिर्फ यह सवाल नहीं पूछता कि इमारत क्यों गिरी? यह उससे बड़ा सवाल पूछता है, इमारत को उस हालत तक पहुंचने दिया कैसे गया? अगर एक इमारत 30 साल पुरानी थी और उसमें लोग रह रहे थे, तो उसकी सुरक्षा जांच कितनी नियमित थी? अगर आसपास भी पुरानी इमारतें हैं तो क्या उनकी स्थिति की जांच होगी? और सबसे अहम क्या किसी दूसरे परिवार को पवन जैसी खबर सुनने से पहले व्यवस्था जागेगी? हादसे के बाद राहत और बचाव अभियान जरूरी है, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी है ऐसे हादसों को रोकना.
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जर्जर इमारतों की पहचान, नियमित संरचनात्मक जांच, नियमों के खिलाफ निर्माण पर कार्रवाई और छात्रों के लिए इस्तेमाल होने वाले पीजी की सुरक्षा व्यवस्था ये सब सिर्फ सरकारी कागजों में दर्ज प्रक्रियाएं नहीं रहनी चाहिए. इनका असर जमीन पर भी दिखाई देना चाहिए. दिल्ली वह शहर है जहां देश के कोने-कोने से युवा अपने सपनों को पंख देने आते हैं. किसी माता-पिता को अपने बच्चे को राजधानी भेजते वक्त यह डर नहीं होना चाहिए कि वह पढ़ाई पूरी करके सुरक्षित घर लौटेगा या नहीं. सत्य निकेतन का मलबा सिर्फ ईंट और सीमेंट का ढेर नहीं है. वह उस व्यवस्था से जवाब मांग रहा है, जो अक्सर हादसा होने के बाद जागती है. सवाल यही है क्या अब सिस्टम हादसे के बाद नहीं, हादसे से पहले जागेगा?


