गोरखपुर: साल 2021 में आई पंकज त्रिपाठी की मशहूर फिल्म ‘कागज’ तो आपको याद ही होगी, जिसमें ‘लाल बिहारी मृतक’ को खुद को कागजों पर जिंदा साबित करने के लिए सालों संघर्ष करना पड़ा था. फिल्म में व्यवस्था के इस स्याह पहलू को भले ही थोड़े हास्य के साथ दिखाया गया हो, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि ऐसी मार झेल रहे आम आदमी के जीवन में न तो कोई हास्य बचा है और न ही संघर्ष करने की हिम्मत.
उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले की सदर तहसील से लापरवाही और सिस्टम की बेरुखी की ऐसी ही कई तस्वीरें सामने आई हैं, जहां राजस्व विभाग के कर्मचारियों (लेखपाल और कानूनगो) की एक छोटी सी गलती की सजा बुजुर्ग और लाचार काश्तकार सालों से भुगत रहे हैं.
क्या है पूरा मामला?
मौजा गौर के रहने वाले 75 वर्षीय बुजुर्ग जंगीलाल इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं. वरासत दर्ज करते समय राजस्व कर्मियों की लापरवाही से जंगीलाल का नाम बदलकर ‘रंगीलाल’ दर्ज कर दिया गया. नाम में हुई इस हेरफेर के कारण खतौनी में जमीन होने के बावजूद उन्हें सभी सरकारी सुविधाओं से वंचित कर दिया गया है. 75 साल की उम्र में जंगीलाल पिछले दो सालों से राजस्व विभाग के चक्कर काट रहे हैं. पीड़ित का आरोप है कि तत्कालीन लेखपाल और कानूनगो ने पैसे न मिलने पर जानबूझकर गलत नाम दर्ज किया था. हद तो तब हो गई जब सुधार के लिए किए गए आवेदन के बाद अब एसडीएम न्यायालय से उनकी पत्रावली (फाइल) ही गायब है. जंगीलाल के अधिवक्ता विशाल जायसवाल ने बताया कि पत्रावली नहीं मिल रही है, जिसे ढूंढवाने का प्रयास किया जा रहा है. अधिकारियों का एक ही रटा-रटाया जवाब है—”जब सुनवाई होगी, तब न्याय मिलेगा.”
आदेश के 2 साल बाद भी खतौनी से नाम गायब
लापरवाही का यह खेल सिर्फ जंगीलाल तक सीमित नहीं है. तहसील सदर में ‘कल्पना चौधरी बनाम सरकार’ का एक और मामला सामने आया है. वर्ष 2024 में इस मामले में मुकदमा हुआ था. अधिवक्ता बैजनाथ यादव के मुताबिक, जमीन का बैनामा हुआ, नामांतरण (दाखिल-खारिज) भी हुआ और एक खतौनी में नाम भी दर्ज हो गया. लेकिन इसके बाद जब अगली खतौनी जारी हुई, तो अमवा की रहने वाली कल्पना का नाम ही गायब कर दिया गया. इस मामले में दो बार रिपोर्ट लग चुकी है, लेकिन दो साल बीत जाने के बाद भी आज तक खतौनी में आदेश दर्ज नहीं हो सका है.
सरकारी फीडिंग में पूरा का पूरा ‘गाटा’ ही गायब
प्रशासनिक लापरवाही का एक और अजीबोगरीब मामला ‘कैसर हुसैन बनाम सरकार’ का है, जो पिछले तीन सालों से लटका हुआ है. अधिवक्ता मनीष श्रीवास्तव ने बताया कि राजस्व कर्मियों द्वारा डेटा फीडिंग के दौरान हुई त्रुटि के कारण मानबेला के कैसर हुसैन की खतौनी से एक पूरा गाटा (जमीन का टुकड़ा) ही गायब हो गया है. अब हालत यह है कि ऑनलाइन सिस्टम में आराजी नंबर डालने पर कोई रिकॉर्ड ही नहीं दिखाता. पीड़ित तीन साल से न्याय के लिए दर-दर भटक रहा है.
राजस्व संहिता की धारा 32/38 की कछुआ चाल, जेब पर भारी
गोरखपुर तहसील सदर में खतौनियों की गलतियों को सुधारने के लिए राजस्व संहिता की धारा 32/38 के तहत होने वाली सुनवाइयों में काश्तकारों को लंबा इंतजार करना पड़ रहा है. तारीख पर तारीख मिलने के कारण एक तरफ जहां ग्रामीण सरकारी योजनाओं के लाभ से वंचित हैं, वहीं दूसरी तरफ वकीलों की फीस और कचहरी के चक्कर काटने से उनकी जेब पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ रहा है.
क्या कहते हैं जिम्मेदार अधिकारी?
इस पूरे मामले पर जब एसडीएम दीपक गुप्ता से बात की गई तो उन्होंने हमेशा की तरह एक आश्वासन देते हुए कहा कि संबंधित पीड़ितों की पत्रावलियों को देखा जाएगा और गुण-दोष के आधार पर इस पर त्वरित निर्णय लिया जाएगा. इन सभी लटके हुए मामलों का जल्द से जल्द निस्तारण सुनिश्चित किया जाएगा. अब देखना यह है कि प्रशासन का यह ‘जल्द’ कब आता है, या फिर जंगीलाल जैसे कई बेकसूर लोग सिस्टम की इस कागजी भूलभुलैया में ऐसे ही पिसते रहेंगे.


