प्रयागराज: वर्ष 1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम जब मेरठ से शुरू होकर प्रयागराज (तत्कालीन इलाहाबाद) पहुंचा, तो यहां की धरती पर इतिहास का एक ऐसा रक्तरंजित और गौरवशाली अध्याय लिखा गया जिसने अंग्रेजी शासन की चूलें हिला दीं. 6 जून 1857 को भड़की इस क्रांति ने न सिर्फ ब्रिटिश सत्ता को खुली चुनौती दी, बल्कि यह साबित कर दिया कि भारत की आजादी की तड़प कितनी गहरी थी. विद्रोही सिपाहियों, तीर्थपुरोहितों और मेवाती समुदाय की एकजुटता ने इस शहर को क्रांति का मुख्य केंद्र बना दिया था.
भारतीय सैनिकों ने फूंका बिगुल, 3000 कैदी कराए मुक्त
इतिहास के पन्नों के अनुसार, मेरठ विद्रोह की भनक लगते ही ब्रिटिश प्रशासन अलर्ट पर था. खजाने और किले की सुरक्षा के लिए यमुना के नौका पुल पर तोपें तैनात थीं. लेकिन 6 जून को भारतीय सैनिकों ने अंग्रेज अफसरों के आदेशों को ठुकराते हुए बगावत का बिगुल फूंक दिया.
क्रांतिकारियों के हौसले का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने दारागंज के नौका पुल पर कब्जा कर कई अंग्रेज अधिकारियों को मौत के घाट उतार दिया. संचार व्यवस्था ठप करने के लिए रेल और टेलीग्राफ लाइनें उखाड़ दीं. जेल के दरवाजे तोड़कर करीब 3,000 कैदियों को आजाद करा लिया. ब्रिटिश किले से लगभग 32 लाख रुपये का खजाना अपने कब्जे में ले लिया.
खुसरोबाग बना मुख्यालय, मौलवी लियाकत अली को 21 तोपों की सलामी
7 जून को महगांव के मौलवी लियाकत अली अपने समर्थकों के साथ प्रयागराज पहुंचे. ऐतिहासिक खुसरोबाग को इस विद्रोह का मुख्यालय बनाया गया. वहां मौलवी लियाकत अली के नेतृत्व की घोषणा करते हुए उन्हें 21 तोपों की सलामी दी गई. इसके बाद समदाबाद और रसूलपुर के मेवाती पठान भी इस महासंग्राम में कूद पड़े, जिससे अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष और तेज हो गया.
इतिहासकारों का मत
प्रयागराज के तीर्थपुरोहित इस आंदोलन के अग्रणी योद्धा बनकर उभरे थे. वहीं, मेवाती समुदाय ने अंग्रेजों का सामान और गोला-बारूद ढोने से साफ इनकार कर क्रांतिकारियों का साथ दिया, जिसने ब्रिटिश सेना की कमर तोड़ दी.
कर्नल नील का क्रूर दमन: पेड़ों पर लटकती थीं लाशें
हालात हाथ से निकलता देख 11 जून 1857 को ब्रिटिश अधिकारी कर्नल जेम्स जॉर्ज स्मिथ नील बनारस से भारी सेना लेकर प्रयागराज पहुंचा. मुट्ठीगंज, कीडगंज और खुसरोबाग में भीषण युद्ध हुआ. अंग्रेजी सेना के आधुनिक और भारी हथियारों के सामने क्रांतिकारियों को पीछे हटना पड़ा. क्रांति को दबाने के लिए कर्नल नील ने क्रूरता की सारी हदें पार कर दीं, समदाबाद, छीतपुर और रसूलपुर समेत कई गांवों को आग के हवाले कर दिया गया. सैकड़ों लोगों को सरेआम पेड़ से लटकाकर सार्वजनिक फांसी दी गई. निर्दोष महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों तक को नहीं बख्शा गया.
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गांवों को उजाड़कर बसाया ‘सिविल लाइंस’ और ‘अल्फ़्रेड पार्क’
क्रांतिकारियों की मदद करने की सजा अंग्रेजों ने पूरे इलाके को दी. जिन आठ गांवों ने विद्रोहियों का साथ दिया था, उन्हें पूरी तरह तबाह कर दिया गया. बाद में इन्हीं उजाड़े गए गांवों की जमीन पर अंग्रेजों ने आज का ‘सिविल लाइंस’ इलाका विकसित किया. वर्ष 1870 में स्थापित अल्फ्रेड पार्क, जिसे आज हम चंद्र शेखर आजाद पार्क के नाम से जानते हैं, इसी ऐतिहासिक दौर और दमन की विरासत है.


