नई दिल्ली, 11 अगस्त 2026. सावन का पवित्र महीना अब अपने सबसे खास पड़ाव पर पहुंच गया है. आज यानी 11 अगस्त को सावन शिवरात्रि मनाई जा रही है. देशभर के शिव मंदिरों में सुबह से ही श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ रही है और भगवान शिव के जलाभिषेक के लिए भक्त कतारों में पहुंच रहे हैं.
सावन शिवरात्रि श्रावण कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मनाई जाती है. उत्तर भारत में इस वर्ष सावन 30 जुलाई से शुरू हुआ है और 28 अगस्त तक चलेगा. पंचांग गणना के अनुसार सावन शिवरात्रि 11 अगस्त को है. चतुर्दशी तिथि 11 अगस्त सुबह 4:54 बजे शुरू होकर 12 अगस्त रात 1:52 बजे तक रहेगी.
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इस दिन भगवान शिव की पूजा, जलाभिषेक, रुद्राभिषेक, मंत्र जाप और उपवास का विशेष महत्व माना जाता है. कांवड़ यात्रा पर निकले शिवभक्त भी गंगाजल लेकर अपने-अपने क्षेत्रों के शिवालयों में पहुंच रहे हैं.
सावन शिवरात्रि पर शिवालयों में उमड़ी आस्था
सावन का महीना भगवान शिव की आराधना के लिए विशेष माना जाता है. इस दौरान भक्त सोमवार का व्रत रखते हैं, शिवलिंग पर जल चढ़ाते हैं और अलग-अलग धार्मिक अनुष्ठान करते हैं.
सावन शिवरात्रि इसी साधना का महत्वपूर्ण दिन माना जाता है. श्रद्धालु इस दिन भगवान शिव की पूजा के साथ उपवास और मंत्र जाप करते हैं. कई मंदिरों में रातभर भजन-कीर्तन और जागरण के कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं.
शिव मंदिरों में इस दौरान ‘हर हर महादेव’, ‘बोल बम’ और ‘ॐ नम: शिवाय’ के जयघोष सुनाई देते हैं.
11 अगस्त को ही क्यों मनाई जा रही है शिवरात्रि
पंचांग के अनुसार श्रावण कृष्ण चतुर्दशी तिथि 11 अगस्त की सुबह 4:54 बजे शुरू होगी और 12 अगस्त की रात 1:52 बजे समाप्त होगी. इसी वजह से सावन शिवरात्रि का व्रत और मुख्य पूजा 11 अगस्त को की जा रही है.
शिवरात्रि में रात के समय पूजा का विशेष महत्व माना जाता है. उपलब्ध पंचांग गणना के अनुसार उत्तर भारत के कई क्षेत्रों में निशीथ काल 12 अगस्त की मध्यरात्रि के आसपास रहेगा. स्थान के अनुसार पूजा के समय में थोड़ा अंतर हो सकता है.
कई श्रद्धालु रात के चार प्रहर में शिव पूजा करते हैं. कुछ भक्त अपनी सुविधा और स्थानीय परंपरा के अनुसार किसी एक प्रहर में भी पूजा करते हैं.
कांवड़ियों के लिए सबसे बड़ा आस्था पर्व
सावन शिवरात्रि का कांवड़ यात्रा से गहरा संबंध है. हर साल बड़ी संख्या में शिवभक्त गंगातट और दूसरे तीर्थस्थलों से पवित्र जल लेकर पैदल अपने क्षेत्र के शिवालयों तक पहुंचते हैं.
कांवड़िए कई दिनों की यात्रा पूरी करने के बाद शिवलिंग पर गंगाजल चढ़ाते हैं. इस दौरान कांवड़ मार्गों पर ‘बोल बम’ और ‘हर हर महादेव’ के जयकारे सुनाई देते हैं.
कई क्षेत्रों में शिवरात्रि के दिन कांवड़ियों द्वारा लाए गए गंगाजल से जलाभिषेक किया जाता है. श्रद्धालुओं के लिए यह यात्रा आस्था, अनुशासन और शिवभक्ति से जुड़ी महत्वपूर्ण परंपरा है.
जलाभिषेक के साथ बेलपत्र और धतूरा चढ़ाने की परंपरा
भगवान शिव की पूजा में जलाभिषेक को प्रमुख माना जाता है. इसके अलावा कई श्रद्धालु दूध, दही, शहद और घी से भी अभिषेक करते हैं. पूजा की विधि अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों की परंपराओं के अनुसार अलग हो सकती है.
शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ाने की परंपरा भी काफी पुरानी है. इसके साथ धतूरा, आक के फूल, भस्म और सफेद पुष्प अर्पित किए जाते हैं.
भक्त इस दौरान ‘ॐ नम: शिवाय’ का जाप करते हैं. धार्मिक परंपरा में पूजा के दौरान बाहरी दिखावे के बजाय श्रद्धा और भाव को अधिक महत्व दिया जाता है.
व्रत में सात्विकता और संयम पर जोर
सावन शिवरात्रि पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु व्रत रखते हैं. व्रत रखने वाले लोग अपनी परंपरा और स्वास्थ्य के अनुसार फलाहार या सात्विक भोजन करते हैं.
धार्मिक मान्यताओं में व्रत को केवल भोजन छोड़ने की प्रक्रिया नहीं माना जाता. इसे मन, वाणी और कर्म में संयम रखने से भी जोड़ा जाता है. भक्त इस दिन ध्यान, मंत्र जाप और पूजा के जरिए खुद को आध्यात्मिक रूप से शांत रखने का प्रयास करते हैं.
समुद्र मंथन और नीलकंठ की कथा
भगवान शिव से जुड़ी पौराणिक कथाओं में समुद्र मंथन की कथा का विशेष स्थान है. मान्यता के अनुसार समुद्र मंथन के दौरान हलाहल विष निकलने पर देवता और असुर चिंतित हो गए थे.
संसार की रक्षा के लिए भगवान शिव ने उस विष को अपने कंठ में धारण कर लिया. विष के प्रभाव से उनका कंठ नीला हो गया और उन्हें नीलकंठ कहा गया.
शिव के नीलकंठ स्वरूप को त्याग, धैर्य और लोककल्याण की भावना से जोड़ा जाता है. सावन में जलाभिषेक की परंपरा को भी कई धार्मिक मान्यताएं इस प्रसंग से जोड़ती हैं.
शिव-पार्वती की पूजा का भी महत्व
सावन शिवरात्रि पर भगवान शिव के साथ माता पार्वती की पूजा भी की जाती है. धार्मिक मान्यताओं में शिव और शक्ति को सृष्टि के महत्वपूर्ण आधार के रूप में देखा जाता है.
कई श्रद्धालु दांपत्य जीवन में सुख-शांति और परिवार की समृद्धि की कामना से शिव-पार्वती की पूजा करते हैं. अविवाहित युवतियों में भी अच्छे जीवनसाथी की कामना से शिव-पार्वती की आराधना करने की परंपरा है.
देवघर से काशी तक शिवमय माहौल
सावन शिवरात्रि पर देश के प्रमुख शिव मंदिरों में विशेष आयोजन किए जाते हैं. काशी, हरिद्वार, उज्जैन, देवघर, प्रयागराज, नासिक और अन्य धार्मिक स्थलों पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं.
देवघर स्थित बाबा बैद्यनाथ धाम में सावन के दौरान विशेष धार्मिक माहौल रहता है. कांवड़िए सुल्तानगंज से गंगाजल लेकर करीब 105 किलोमीटर की पैदल यात्रा पूरी करने के बाद देवघर पहुंचते हैं और बाबा बैद्यनाथ का जलाभिषेक करते हैं.
सावन शिवरात्रि के अवसर पर मंदिर और आसपास के इलाकों में ‘बोल बम’ और ‘हर हर महादेव’ के जयकारे गूंजते हैं.
सावन के दूसरे सोमवार के अगले दिन शिवरात्रि
इस वर्ष सावन का दूसरा सोमवार 10 अगस्त को था और उसके अगले दिन 11 अगस्त को सावन शिवरात्रि मनाई जा रही है. इस वजह से लगातार दो दिनों तक शिवभक्ति का खास माहौल बना हुआ है.
उत्तर भारत में सावन के चार सोमवार 3 अगस्त, 10 अगस्त, 17 अगस्त और 24 अगस्त को हैं. सावन पूर्णिमा 28 अगस्त को होगी.
मंदिरों और कांवड़ मार्गों पर व्यवस्था भी जरूरी
शिवरात्रि के दिन मंदिरों में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के पहुंचने की संभावना रहती है. ऐसे में पूजा के साथ व्यवस्था और अनुशासन बनाए रखना भी जरूरी है.
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कांवड़ यात्रियों के लिए यात्रा के दौरान स्वच्छता, यातायात नियमों का पालन और दूसरे श्रद्धालुओं की सुविधा का ध्यान रखना महत्वपूर्ण है. धार्मिक आयोजनों में आस्था के साथ संयम, सहयोग और सद्भाव भी जरूरी है.
सावन शिवरात्रि की रात भक्त भगवान शिव का ध्यान, मंत्र जाप, जलाभिषेक और रुद्राभिषेक करते हुए शिवभक्ति में लीन रहते हैं. मंदिरों में गूंजता ‘हर हर महादेव’ का जयघोष इस पर्व की आस्था और भक्ति का प्रमुख प्रतीक बनता है.


