Middle Class Life Reality: हर इंसान की जिंदगी में एक वाक्य बार-बार दोहराया जाता है- ‘अभी सही उम्र नहीं है’, ‘अभी सही समय नहीं है’, ‘बाद में कर लेना’.
जब कोई बच्चा शरारत करता है, तो बड़े समझाते हैं कि अच्छे बच्चे शैतानी नहीं करते. बच्चा घूमने की बात करे तो कहा जाता है-पहले पढ़ाई पूरी करो, बड़े हो जाओ, तब जाना. बेटा दोस्तों के साथ फिल्म या मौज-मस्ती करे तो जवाब मिलता है-अभी करियर बनाने का समय है, ये सब बाद में करना. पत्नी मायके जाने की बात करे तो पति कहता है-अभी क्यों जाना, पूरी उम्र पड़ी है.
चेहरे पर आलू का रस लगाते ही दिखेगा फर्क, दाग-धब्बे से लेकर टैनिंग तक होगी गायब!

लेकिन सच यह है कि यह ‘बाद में’ कभी आता ही नहीं.
वक्त चुपचाप निकलता रहता है. वही शरारती बच्चा किताबों के बोझ में दब जाता है. घूमने की चाहत स्कूल और ट्यूशन के बीच दम तोड़ देती है. वह बेटा, जो दोस्तों के साथ हंसता-खेलता था, नौकरी की जिम्मेदारियों में इतना उलझ जाता है कि पैसा होने के बावजूद न दोस्तों के लिए वक्त निकाल पाता है, न खुद के लिए. मूवी देखने का शौक ‘वीकेंड कभी और’ में बदल जाता है, और वह कभी नहीं आता.
घर-परिवार की जिम्मेदारियां इंसान को धीरे-धीरे जकड़ लेती हैं. सपने टाले जाते हैं, इच्छाएं दबा दी जाती हैं और खुशियों को ‘फिलहाल नहीं’ कहकर किनारे रख दिया जाता है.
सबसे ज्यादा असर पड़ता है रिश्तों पर.
वह पत्नी, जो कभी मायके जाने की जिद करती थी, एक दिन चुप हो जाती है. इसलिए नहीं कि उसका मन नहीं करता, बल्कि इसलिए कि अब वह उम्र और समय निकल चुका होता है. जिस दौर में मां-बाप के साथ बैठकर बातें करनी थीं, भाई-बहनों के साथ हंसी-मजाक करना था, यादें बनानी थीं-वह दौर बीत चुका होता है. अब सब अपनी-अपनी जिंदगी में उलझ चुके होते हैं. मिलने पर बातें होती हैं, लेकिन पहले जैसी गर्माहट नहीं रहती.

यही वह जगह है, जहां इंसान अंदर से टूटने लगता है.
अक्सर बड़े यह सोचकर रोकते-टोकते हैं कि वे सामने वाले की भलाई कर रहे हैं. उन्हें लगता है कि शौक, खुशी और आज़ादी को रोकना अनुशासन है. लेकिन हकीकत यह है कि लगातार मनाही, टोका-टाकी और नियंत्रण रिश्तों में दूरी पैदा कर देता है.
‘उम्र’ और ‘शौक’ का रिश्ता बड़ा कड़वा सच है.
जो काम जिस उम्र में अच्छा लगता है, वह उम्र निकलने के बाद वैसा महसूस ही नहीं होता. तब इंसान के पास साधन होते हैं, लेकिन मन नहीं. समय होता है, लेकिन लोग नहीं. पैसे होते हैं, लेकिन खुशी नहीं.
इस सोच का असर क्या होता है?
इंसान अपनी ही जिंदगी से असंतुष्ट रहने लगता है
रिश्तों में भावनात्मक दूरी बढ़ जाती है
मन में पछतावा जमा होता चला जाता है
लोग अपनों से खुलकर बात करना बंद कर देते हैं
खुशियों को एन्जॉय करने की आदत खत्म हो जाती है
सबसे बड़ा नुकसान यह होता है कि इंसान जीना भूल जाता है और सिर्फ निभाता रहता है.
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सच क्या है?
सच यह है कि हर उम्र की अपनी खुशियां होती हैं.
जो आज किया जा सकता है, वह कल नहीं किया जा सकता.
जो आज महसूस किया जा सकता है, वह कल सिर्फ याद बनकर रह जाता है.
शायद अब वक्त आ गया है कि हम ‘अभी सही समय नहीं है’ कहना कम करें और
‘अगर दिल चाहता है, तो आज ही सही समय है’ कहना सीखें.
क्योंकि जिंदगी इंतजार नहीं करती…
और सही उम्र अक्सर हाथ से निकल जाती है.


