Basti News: जब कोई नदी दम तोड़ने लगती है तो अक्सर लोग उसकी दुर्दशा पर अफसोस जताकर आगे बढ़ जाते हैं, लेकिन बस्ती के युवा समाजसेवी आकाश गुप्ता ने शिकायत करने के बजाय जिम्मेदारी उठाई. बचपन की यादों से जुड़ी पौराणिक मनोरमा नदी को बचाने के लिए शुरू की गई उनकी मुहिम आज पूरे देश में प्रेरणा बन चुकी है. उनकी इस पहल की गूंज देश के सर्वोच्च मंच मन की बात तक पहुंची, जहां प्रधानमंत्री ने भी इस प्रयास की सराहना की.
मनोरमा की पुकार सुन उठा युवा
बस्ती की पौराणिक मनोरमा नदी लंबे समय से प्रदूषण, प्लास्टिक कचरे और जलकुंभी की समस्या से जूझ रही थी. हालात इतने खराब हो चुके थे कि कई स्थानों पर नदी नाले जैसी दिखाई देने लगी थी. ऐसे में आकाश गुप्ता ने अपने कुछ साथियों के साथ मिलकर नदी को पुनर्जीवित करने का संकल्प लिया.
शुरुआत में आकाश अकेले नदी में उतरकर सफाई करते थे, लेकिन उनकी लगन और मेहनत देखकर धीरे-धीरे अन्य युवा भी जुड़ते चले गए. देखते ही देखते 6 से 7 युवाओं की एक समर्पित टीम तैयार हो गई. पिछले दो महीनों से यह टीम प्रतिदिन 4 से 5 घंटे नदी में उतरकर प्लास्टिक, पॉलीथिन, बोतलें, जलकुंभी और अन्य कचरा निकालने का काम कर रही है.
700 किलो कचरा और एक संकल्प
करीब 60 दिनों तक चले इस अभियान के दौरान नदी से लगभग 700 किलो कचरा बाहर निकाला गया. हालांकि यह सफर आसान नहीं था. गंदे पानी में उतरने से त्वचा संक्रमण का खतरा, सांप-बिच्छुओं का डर और लोगों की आलोचनाएं भी सामने आईं, लेकिन टीम ने हार नहीं मानी और अपने मिशन को जारी रखा.
मुरझाती मनोरमा में फिर बहने लगी उम्मीद
सिर्फ सफाई अभियान ही नहीं, आकाश और उनकी टीम ने सोशल मीडिया के माध्यम से भी लोगों को जागरूक किया. वीडियो बनाकर लोगों को बताया गया कि नदी में कचरा फेंकने से किस तरह पर्यावरण और जल स्रोतों को नुकसान पहुंचता है. उनके प्रयासों का असर अब साफ दिखाई दे रहा है. मनोरमा नदी का पानी पहले की तुलना में स्वच्छ नजर आने लगा है, लोग नदी में स्नान कर रहे हैं और पशु भी इसका पानी पी रहे हैं.
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार मनोरमा नदी का संबंध भगवान श्रीराम और अयोध्या की धार्मिक परंपराओं से भी जोड़ा जाता है. कभी इस नदी के किनारे धार्मिक आयोजन, घाट और मंदिरों की रौनक हुआ करती थी, लेकिन समय के साथ अतिक्रमण, गाद और प्रदूषण ने इसकी पहचान को धूमिल कर दिया.
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आज आकाश गुप्ता और उनकी टीम की मेहनत ने लोगों के भीतर नई उम्मीद जगाई है. यह अभियान साबित करता है कि यदि समाज के युवा ठान लें तो किसी भी नदी, पर्यावरण या विरासत को नया जीवन दिया जा सकता है. बस्ती के इन युवाओं ने न सिर्फ एक नदी को बचाने का काम किया है, बल्कि पूरे समाज को जिम्मेदारी और जनभागीदारी का संदेश भी दिया है.


