अयोध्या: भव्य राम मंदिर के दानपात्रों (हुंडियों) से करोड़ों रुपये के गबन के मामले में हर दिन चौंकाने वाले खुलासे हो रहे हैं. इस पूरे प्रकरण में सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि आखिर हुंडियों से कुल कितनी रकम चोरी हुई, इसका सटीक आंकड़ा कभी क्यों नहीं मिल पाएगा? पुलिस जांच और अंदरूनी सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक, इस महाघोटाले के पीछे मंदिर ट्रस्ट के भरोसे का कत्ल और सुरक्षा व चेकिंग में बरती गई भारी लापरवाही है. आइए समझते हैं कि कैसे इस पूरे खेल को अंजाम दिया गया और क्यों चोरी की गई रकम का अंतिम हिसाब लगाना लगभग नामुमकिन हो चुका है.
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क्यों कभी पता नहीं चलेगी चोरी की सटीक रकम?
राम मंदिर में आने वाले चढ़ावे को गिनने और उसकी सुरक्षा के लिए एक तय सिस्टम लागू होने से काफी पहले ही इस गैंग ने मंदिर के भीतर अपनी जड़ें जमा ली थीं. एडवोकेट प्रांशु अग्रवाल के अनुसार, यह मामला पूरी तरह से नैतिक पतन और सिस्टम की विफलता का उदाहरण है. ट्रस्ट और बैंक के पदाधिकारियों ने नकदी जैसे संवेदनशील मामले में बेहद कैजुअल (लापरवाह) रवैया अपनाया. जब इन आरोपियों ने नकदी संभालना शुरू किया, तब कोई सख्त इंटरनल कंट्रोल या चेकिंग मैकेनिज्म मौजूद नहीं था. यही वजह है कि यह खेल कितने समय से चल रहा था और कुल कितनी रकम पार की गई, इसका सटीक आकलन कर पाना अब नामुमकिन है.
कैसे जीता ट्रस्ट का भरोसा? (मास्टरमाइंड अनुकल्प का खेल)
गिरफ्तार किए गए 8 आरोपियों में से 4 मुख्य आरोपी (अविनाश, अनुकल्प, लवकुश और करुणेश) बहुत पहले से ही वालंटियर के रूप में मंदिर से जुड़ गए थे. इनमें अनुकल्प मिश्रा ने सबसे शातिर तरीके से काम किया.अनुकल्प मंदिर के शिखर पर ध्वजारोहण, पहली व दूसरी वर्षगांठ के समारोहों और भव्य दीपोत्सव जैसे प्रमुख आयोजनों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेता था. लगातार सक्रिय रहने के कारण वह अहम बैठकों का नियमित चेहरा बन गया और उसने राम मंदिर ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय और सदस्य अनिल मिश्रा का गहरा भरोसा जीत लिया.
जब ट्रस्ट के दिग्गजों का भरोसा मजबूत हो गया, तो अनुकल्प ने अपने करीबी साथियों की पहचान पदाधिकारियों से कराई. चूंकि ये लोग दशकों से भगवा संगठनों से जुड़े हुए थे, इसलिए ट्रस्ट ने बिना किसी गहन बैकग्राउंड वेरिफिकेशन के, केवल अनुमान और भरोसे के आधार पर इन्हें नकदी गिनने जैसी बड़ी जिम्मेदारी सौंप दी.
महाकुंभ और बैंक की मजबूरी का उठाया फायदा
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, महाकुंभ 2025 के दौरान राम मंदिर की हुंडियों में अचानक भारी मात्रा में चढ़ावा आने लगा. उस वक्त भारतीय स्टेट बैंक (SBI) के पास इस कैश मैनेजमेंट के लिए तुरंत अतिरिक्त मैनपावर (कर्मचारी) उपलब्ध नहीं थी. इस आपात स्थिति में ट्रस्ट ने उन पुराने वालंटियर्स को काम पर लगाने का फैसला किया जिन्होंने अतीत के कार्यक्रमों में अच्छा काम किया था. यहीं से अविनाश, अनुकल्प, लवकुश और करुणेश की चौकड़ी को कैश काउंटिंग रूम का सीधा एक्सेस मिल गया. बाद में जब एसबीआई ने वाराणसी की प्राइवेट एजेंसी ‘सैनिक सिक्योरिटी सर्विसेज’ को हायर किया और उसके 40 युवाओं को तैनात किया, तब तक ये आरोपी पहले से ही वहां नकदी संभाल रहे थे और सिस्टम का हिस्सा बन चुके थे.
अब तक किस आरोपी से कितनी हुई रिकवरी?
पुलिस जांच के केंद्र में मुख्य रूप से अविनाश, अनुकल्प, लवकुश और करुणेश की चौकड़ी ही है, जिनकी रिमांड के लिए पुलिस ने कोर्ट से मांग की थी. अब तक पुलिस इन आरोपियों के पास से लगभग 80 लाख रुपये की नकदी और आभूषण बरामद कर चुकी है. इस खुलासे के बाद अब न सिर्फ आरोपियों पर शिकंजा कसा जा रहा है, बल्कि मंदिर ट्रस्ट और बैंक प्रबंधन के आंतरिक सुरक्षा ऑडिट पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं. कानून के जानकारों का मानना है कि इतनी बड़ी लापरवाही बरतने वाले पदाधिकारियों की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए, जिन्होंने आस्था के केंद्र में चोरों को खुली छूट दे रखी थी.


