जाग रहा है, जाग रहा है,
भारत का युवा अब जाग रहा है.
बेरोजगारी से टूटा हुआ,
रोटी को तरसता हुआ,
हाथों में लेकर डिग्री वाली फाइलें,
कुछ करने को साज रहा है,
भारत का युवा अब जाग रहा है.
कभी शहरों की भीड़ में खोया,
कभी गांव की सूनी राहों में रोया,
आंखों में सपनों का समंदर लेकर
अपनों की उम्मीदों का बोझ ढोया.
दिन-रात किताबों में जिसने
अपनी जवानी को जला दिया,
उसी ने आज नौकरी के दरवाज़ों पर
अपना सिर झुका दिया.
मां की आंखों में उम्मीदें हैं,
पिता के माथे पर चिंता की लकीर,
बहन की शादी, घर का खर्चा,
सब कुछ लगता जैसे भारी जंजीर.
डिग्रियां दीवारों पर टंगी हैं,
पर हाथों में काम नहीं,
मेहनत करने वालों को भी
मिलता कोई सम्मान नहीं.
कहीं पेपर लीक का अंधेरा,
कहीं भ्रष्टाचार का जाल,
काबिल युवा पीछे छूटे,
और बिकते सपनों के दलाल.
कोचिंग की गलियों में भटकते,
लाखों अरमानों के कारवां,
नींद खो चुकी इन आंखों में
अब बस बचा है एक धुआं.
मोबाइल की चमक के पीछे
टूट रहा अंदर का इंसान,
तनाव, अवसाद और अकेलापन
बन बैठे हैं उसकी पहचान.
सिस्टम की खामोशी से घायल,
वो भीतर ही भीतर रोता है,
भीड़ में हंसता दिखता लेकिन
रातों में चुपचाप सोता है.
किसान का बेटा खेत छोड़कर
शहरों में धक्के खा रहा,
मजदूर का बच्चा पढ़-लिखकर भी
अपना भविष्य गंवा रहा.
महंगाई की आग में जलते
सपनों का हिसाब कौन देगा?
युवाओं की टूटी उम्मीदों का
अब जवाब कौन देगा?
लेकिन अब आंखों में केवल
आंसू भरकर बैठा नहीं,
अन्याय के हर अंधेरे से
डरकर अब वो ऐंठा नहीं.
वो अपने हक की बात करेगा,
हर झूठी दीवार गिराएगा,
कलम उठाकर, आवाज़ बनकर
नया इतिहास बनाएगा.
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अब चुप्पी की जंजीरें टूटेंगी,
सड़कों पर सवाल उठेंगे,
मेहनत और सच्चाई वाले
एक दिन फिर से जीतेंगे.
नफरत, भूख और भ्रष्टाचार से
अब लड़ने का समय आ गया है,
सोया हुआ हर एक युवा
अब सचमुच जाग गया है.
जाग रहा है, जाग रहा है,
भारत का युवा अब जाग रहा है.


