आसां नहीं होता किसी मासूम को रोते छोड़कर आना,
आसां नहीं होता उन नन्हीं उंगलियों से अपनी उंगली छुड़ाना.
कहते को आ जाती हूं मैं दफ्तर,
दिल करता है वापस दौड़ जाऊं उसके पास मैं,
हर रोज करके कोई न कोई बहाना…
हर रोज आईने में खुद को समझाती हूं,
आंखों के काजल से पहले आंसू पोंछ जाती हूं.
बैग में फाइलें हैं, दिमाग में मीटिंग्स,
पर दिल में बस वही छोटी-सी आवाज,
‘मम्मा, जल्दी आना.’
लिफ्ट की दीवारों पर टिके सपने
मन ही मन में युद्ध करते हैं.
कभी अपराधबोध जीत जाता है,
कभी जरूरतें हाथ पकड़ लेती हैं.
दो दुनियाओं के बीच
मैं रोज़ खुद को आधा-आधा बांट देती हूं.
कैंटीन की कॉफी में
उसकी बोतल का दूध सा घुला रहता है,
कैलेंडर के हर दिन पर
उसके वैक्सीनेशन की तारीखें लिखी हैं.
कॉल के बीच-बीच
घर से आई फोटो पर मुस्कान उधार लेती हूं,
और ईमेल के साइन-ऑफ में
अपनी थकान छुपा देती हूं.
कभी लोग कहते हैं-
‘सब संभाल लेती हो, मजबूत हो.’
कहां जानते हैं वे
कि मासूम होठों की हर स्माइल
मेरा सुकूून बन जाती है.
लोगों के तानों की भी तपिश
न मुझे डिगा पाती है.
फिर भी सुबह होती है,
और मैं उठती हूं.
उसके माथे पर चूमकर
अपने सपनों को भी साथ ले जाती हूं.
क्योंकि मेरी मेहनत में
उसका भविष्य सांस लेता है,
और मेरी गैरहाज़िरी में
वो रोता और इंतज़ार करता है.
एक दिन वह समझेगा
कि ये दूरियां मजबूरी थीं, बेबसी नहीं.
मेरी हथेलियों की लकीरों में
उसकी उंगलियों के निशान हैं.
मैं मां हूं, जो काम भी करती है,
और हर कदम पर
अपने बच्चे के लिए
थोड़ा और मजबूत हो जाती है.
भगवान भी मां के बिना अधूरा है…..


