बरगी डैम की लहरों में जब, मौत का साया आया था,
एक मां ने अपनी जान से बढ़कर, ममता को अपनाया था.
बरगी का वो शांत पानी, पल भर में ही बैरी हुआ,
पर मां का दामन उस घड़ी भी, बच्चे के लिए प्रहरी हुआ.
चारों तरफ चीखें थीं, और गहराता सा अंधकार था,
सांसें उखड़ती जा रही थीं, पानी का प्रहार था.
पर मां की बाहें थककर भी, बच्चे को थामे बैठी थीं,
मानो लहरों की सरहद पर, वो ढाल बनकर लेटी थीं.
आखिरी सांस जब फेफड़ों में दम घुटा, और आंखें होने लगीं बंद,
तब भी न ढीला पड़ सका, ममता का वो पावन बंधन.
लहरें उसे खींचती रहीं, पाताल की गहराइयों में,
पर मां तो सो गई लेकर उसे, अपनी ही परछाइयों में.
वो डूब रही थी धीरे-धीरे, पर लाल का हाथ नहीं छोड़ा उसने,
मौत की उन बेरहम शर्तों से, नाता नहीं जोड़ा उसने.
दुनिया ने देखा जब मंजर, तो पत्थर भी पसीज गए,
मां के उस पावन बलिदान से, सबके दामन भीज गए.
कहते हैं खुदा हर जगह, खुद पहुंच नहीं पाता है,
इसीलिए शायद इस जमीं पर, मां को वो बनाता है.
बरगी की उन लहरों ने, बस जिस्म को ही मारा था,
पर हार गई वो मौत भी, जहां मासूम को मां का सहारा था.
तस्वीर नहीं वो दर्द है, जो रूह को झकझोर दे,
इंसानियत के सोए हुए, हर तार को वो तोड़ दे.
बच्चा तो सो गया था मां की, उसी पुरानी गोद में,
मौत भी रोई होगी उस दिन, ममता के उस विरोध में.
अब शांत है बरगी का जल, और शांत हैं वो धड़कनें,
पर छोड़ गईं इस जगत में, अनगिनत सी तड़पनें.
वो मां नहीं, वो प्यार की, एक जीती-जागती मूरत थी,
जो मौत के आगोश में भी, सबसे ज्यादा खूबसूरत थी.
सलाम है उस ममता को, सलाम है उस बलिदान को,
जिसने झुकने न दिया कभी, मां के उस ऊंचे मान को.
बरगी की लहरों में अब, एक कहानी अमर हुई,
मां के निस्वार्थ प्रेम की, ये दास्तां हर घर हुई.


