रेत के सन्नाटे में जो हरियाली बन जाए,
तपती धरती पर जो जीवन की छाया लाए.
आxधी-तूफ़ानों से जो अडिग खड़ी रह जाए,
वह खेजड़ी है, मरुधरा की सच्ची माई.
सूखी धरती की सांसों में जो नमी भर दे,
भूखे पशु, थके पंछी, सबको सहारा दे.
धूप की आग में भी जो ठंडी छाया दे,
वह खेजड़ी, जीवन का उजियारा दे.
जब लोभ ने कुल्हाड़ी उठाई थी क्रूर,
जब राजसत्ता को न दिखा था कोई नूर.
तब खेजड़ली की माटी बोली थी भरपूर,
“पेड़ नहीं कटेगा, चाहे जाएँ हम दूर.”
अमृता देवी खड़ी हुईं, दृढ़ विश्वास लिए,
तीन बेटियों संग पेड़ों से लिपटकर जिए.
बोलीं-“सिर जाए तो जाए, रूंख न कटे,
इतिहास में ये शब्द अमर होके चमके.
एक नहीं, दो नहीं, तीन सौ तिरसठ बलिदान,
मां-बेटी, बेटा, बूढ़ा सब बने पहचान.
खून से सींची गई खेजड़ी की हर एक जान,
धरती ने आँसुओं से लिखा नया संविधान.
तब थमी थी तलवार, रुकी थी कटाई,
राजा का हृदय पसीजा, बदली थी रीत-रिवाज.
बिश्नोई की धरती ने दी पर्यावरण को परिभाषा,
जहाँ वृक्ष है देव, और जीवन है समाज.
आज फिर खतरे में है वह हरियाली पुरानी,
कंक्रीट की भूख निगल रही है धरती की कहानी.
अगर आज भी न जागे मानव की चेतना ज्ञानी,
तो सूनी रह जाएगी आने वाली ज़िंदगानी.
आओ फिर खेजड़ी से वादा दो,
हर कटते पेड़ पर आवाज़ उठाओ.
यह केवल वृक्ष नहीं, संस्कृति की पहचान है,
इसे बचाना ही सच्चा अभियान है.
खेजड़ी बचेगी तो मरुस्थल मुस्काएगा,
धरती का भविष्य फिर से हरियाएगा.
आज नहीं तो कब? अभी नहीं तो कैसे?
खेजड़ी बचाओ – यही जीवन का संदेश है.
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