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Browsing: कविता
लिखना तो बहुत कुछ है,पर लिख नहीं पा रही हूं,ऐ मेरी नन्हीं जान, तुम हो मेरे अंदर,बस यह अहसास जिए…
जिस दिन ब्याह कर आई थी,मन में न जानें कितनी शंकाएं थी.कैसा होगा नया परिवार,ये सोच-सोच कर मन ही मन…
उलझी हूं मैं खुद में,सुलझ नहीं पा रही हूं,किनारे पर है कश्ती,फिर भी निकल नहीं पा रही हूं. मन परेशान…
ये फरवरी, मार्च, अप्रैल का महीनान जाने क्या रंग दिखलाता है,साल भर अच्छा रहने वाला दोस्तखुद ही दुश्मन बन जाता…
उलझनें तुम्हारी कोई नहीं समझेगा,उलझने को हर कोई, और उलझेगा.क्या बीत रही है तुम पर,जानबूझ कर कोई नहीं पूछेगा.बताना भी…
एक छोटी सी कहानी है,जो सबको सुनानी है.न इसमें कोई राजा है,और न ही इसमें कोई रानी है,एक छोटी सी…
तुमसे इश्क़ किया तो जाना है,तुम्हारे कंधों पर अनगिनत जिम्मेदारियों का ताना-बाना है.तुम सिर्फ मेरे पति नहीं हो,बेटा हो, भाई…
कुछ महीने पहले मेरी जिंदगी कुछ और ही थी. बेफ्रिक चलना, घूमना-फिरना, कुछ भी खाना. फिर यह सिलसिला थम सा…
क्यों आती है शर्म तुम्हें,तुम क्यों छिपाती हो,जानने दो सबको कि हर महीनेजिस्म से तुम कितना खून बहाती हो? आने…
मुझे सफल खुद से ज्यादा, दूसरों के लिए होना है,जिनकी नजर में मेरी मेहनत मिट्टी का खिलौना है.वो जिन्होंने देखी…

